विश्वनाथ कॉरिडोर में हादसा: सदियों पुरानी काशी की परंपरा पर भी ग्रहण की आशंका
काशी विश्वनाथ कारिडोर इलाके में पूर्व महंत कुलपति तिवारी के आवास का एक हिस्सा ध्वस्त होने बाद मंदिर से जुड़ी कुछ खास परंपराओं के भी खंडित होने का खतरा मंडराने लगा है। इनमें अधिकतर परंपराएं बाबा के विवाहोत्सव से जुड़ी हैं। इसकी शुरुआत वसंत पंचमी पर बाबा के तिलकोत्सव से होती है। वसंत पंचमी पर महंत परिवार के सदस्य बाबा का तिलकोत्सव करते हैं। रंगभरी एकादशी के दिन महंत जी के आवास से ही सिंहासन पर सवार पंच बदन प्रतिमा मंदिर तक जाती है। 350 साल प्राचीन सिंहासन ही मलबे में दब कर क्षतिग्रस्त हो गया है। पंच बदन प्रतिमाएं भी महंत जी के आवास से मंदिर के गेस्ट हाउस में पहुंचा दी गई हैं।
हादसे के बाद विश्वनाथ मंदिर के नेमियों की पहली चिंता बाबा का तिलकोत्सव है। अब वे सोच रहे हैं कि भवन गिरने के बाद तिलकोत्सव के आयोजन स्थल और क्षतिग्रस्त रजत सिंहासन का विकल्प क्या होगा। नेमी विवेक पांडेय, अविनाश सिंह, राधारमण दुबे, सुशील कुमार, हर्षित अग्रवाल आदि का कहना है कि यदि महंत परिवार 29 जनवरी को वसंत पंचमी तक गेस्ट हाउस में ही रहता है तो क्या बाबा का तिलकोत्सव भी वहीं होगा।
महंत परिवार वसंत पंचमी से रंगभरी एकादशी, 6 मार्च तक चार प्रमुख रस्में निभाता है। दूसरी रस्म मटकोर की है जो महाशिवरात्रि (इस वर्ष 21 फरवरी) से दो दिन पूर्व होती है। तीसरी रस्म महाशिवरात्रि तिथि पर गौरा को दुल्हन रूम में सजा कर विवाह मंडम में भेजने की है। विवाह मंडप विश्वनाथ मंदिर में बनता है। चौथी प्रमुख रस्म रंगभरी एकादशी पर निभाई जाती है। इस तिथि पर देवी पार्वती का गौना किया जाता है।
हाल के करीब दो दशकों से रंगभरी एकादशी पर महंत आवास में सांस्कृतिक उत्सव शिवांजलि का आयोजन होता रहा है। देश के जाने माने कलाकार शिव और होली से जुड़े गीतों व नृत्यों की प्रस्तुति करते थे। इस उत्सव की समाप्ति के बाद पालकी में भगवान शिव और माता पार्वती की विदाई भगवान गणेश के साथ की जाती है। नेमियों को इस सांस्कृतिक उत्सव पर भी ग्रहण लगते दिख रहा है।